किसान मूत्र पीने पर मजबूर लेकिन सरकार काे फर्क नहीं ? ये कैसी माेदी सरकार है?*

*किसान मूत्र पीने पर मजबूर लेकिन सरकार काे फर्क नहीं ? ये कैसी माेदी सरकार है?*
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किसान की कलम से✍✍

@भागचन्द सामाेता

याद कीजिये 2014 का वाे चुनावी दाैर जब श्री नरेन्द्र माेदी जी अपनी रैली में कहा करते थे कि मेरा किसान व जवान ही देश की ताकत है | मुझे इस सरकार के हर फैसले में थाेड़ी बहुत कमी दिखती रही है *क्याें कि मेरी आंख ठीक है लेकिन आज जब मैंने एक चाैंकाने वाला समाचार सुना ताे मैंने भगवान से प्रार्थना की हे भगवान एेसा दृश्य दिखाने से पहले मुझे अंधा क्याें नहीं कर दिया ?* *जिसे देश का अन्नदाता कहा जाता है वाे मूत्र पीने पर मजबूर क्याें हुआ ? समाचार यहां तक भी है कि यदि अब भी सरकार किसानाें से बात नहीं करती ताे वे *मानव मल* खायेंगें | दरअसल भारत की राजधानी के जन्तर मंतर पर पिछले कई दिनाें से देश के किसान प्रर्दश कर रहें हैं, मुद्दा है कर्ज माफी | यानि देश का पेट पालने वाले किसान चाहते हैं कि उन्हाेने खेती के लिये जाे कर्ज ले रखा है वाे सरकार माफ कर दे | सरकार इस मुद्दे पर उनसे बात करे लेकिन सरकार के पास कर्ज माफ करना ताे छाेड़ाे उनकाे (किसानाे) आसवान देने का भी समय नहीं है |

सरकार के पास देश के गरीब किसान के लिये इतना भी समय नहीं है कि वाे इनकाे बुलाकर बात कर सके जबकि किसान दिल्ली में पहुंचे है सरकार काे अपने घर भी नहीं बुला रहे | माेदी जी इतने व्यस्त हैं कि इनके पास अब किसानाें के लिये समय नहीं है |

याद कीजिये जब वाेट मांगने का समय आता है ताे यही माेदी जी अपने आप काे इतने गरीब बताते हैं जितना शायद ये किसान भी नहीं हाेगें | माेदी जी रैली में कहते हैं कि मैं ट्रेन में चाय बेचता था | *मैं यकिन के साथ कह सकता हूं कि चाय बेचने वाला व्यक्ति गरीबाें के प्रति इतना संवेदनहीन नहीं हाे सकता कि वे मानव मूत्र पीने पर मजबूर हाे जायें आैर उनके पास मिलने का समय नहीं हाे* | हांलाकि ये सब अचानक नहीं हुआ है | किसान पिछले कई दिनाें से देश की राजधानी में अलग-अलग तरीके से प्रर्दशन करते आ रहे हैं जिसमें नगें हाेकर लेटना से लेकर नर मुंड (मानव खाेपड़ी) हाथ में लोकर प्रर्दशन तथा अब मानव मूत्र पीना व आगे मानव मल खाने तक का प्रर्दशन शामिल है |

जिसकाे लाेकतंत्र का चाैथा स्तम्भं कहा जाता है यानि मिडिया, उसके पास भी समय नहीं है कि वाे किसानाें की मजबूरी काे दिखा सके | हाे भी कैसे क्याें कि नेताआें काे वाेट व मिडिया काे नाेट की पड़ी है किसानाें से किसी काे क्या ? मिडिया के पास ताे चुनावी हुड़दंग आैर माेदी व याेगी सरकार के असफल ताबड़ताेड़ फैसलाें तथा मुद्दा विहीनी “तीन तलाक” ज्यादा महत्वपूर्ण है क्याें कि नाेट इन्हीं मुद्दाें काे जनता के सामने रखने पर मिल सकते हैं | रही सही कसर पतंजली के प्रचार में निकल जाती है | पिछले वित्त वर्ष में इसी मिडिया के चैनलाें पर हर दिन आैसतन 20 घंटे पतंजली का प्रचार चला यानि नाेटाें की बरसात हुई ताे फिर मिडिया किसानाें की बात क्याें करे ?

एेसा नहीं है कि सरकार किसानाें का कर्ज माफ नहीं कर सकती है लेकिन नियत में खाेट है | विजय माल्या सरकार व मिडिया के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय किसानाें के क्याें कि वह इन्हीं किसानाें व देश के मध्यम वर्ग के टैक्स के पैसाें काे कर्ज के रूप में लेकर डकार गया है आैर अब लाेग उसकी तपफ टकटकी लगाये देख रहे हैं कि कुछ हिस्सा उनकाे वापस मिल जाये |

मैं मानता हूं कि इसमें हम सबकी भी गलती है | जब भी किसान व जवान से संबधित काेई मुद्गा हाेता है ताे हम एक दाे दिन चर्चा करके छाेड़ देते हैं या फिर चुनाव व बैंक से कर्ज के रूप में चाेरी किये गये मुद्दे पर हम ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं | याद रहे जब अन्नदाता नहीं ताे कुछ नहीं है | सबका विकास सबका साथ तब ही दिखाई देता है जब हमारा पेट भरा हाेता है | कहते हैं न भूखे भजन न हाेय गाेपाला यानि भूखे रहने से भगवान की पूजा भी नहीं की जा सकती है ताे फिर हमारे पेट भरने वाले की परेशानी पर हम चुप कैसे बैठ सकते हैं | ये कैसे हाे सकता है कि पालनकर्ता मानव मल खाने की साेच रहा है आैर हम आराम से बैठकर उसी का उगाया हुआ अन्न खा रहे हैं |™ अब यदि हम भी सरकार की तरह हैं ताे फिर उनकाे काेई जरूरत नहीं है हमारी | जान लें किसान व जवान दाे ही विकल्प हैं जाे देश का आधार यानि नींव है आैर आप जानते हैं जब मकान की नींव कमजाेर हाे जाये ताे फिर वाे मकान धरासायी हाे जाता है|

चुनाव आते ही फिर से सबकाे किसानाें की सताने लगेगी | तवा गरम करना शुरू कर देंगें किसी के द्वारा अपनी रैली में एक बेकसूर काे पेड़ पर फांसी लगवाकर किसान करार दे दिया जायेगा | उसके बाद उनके घरवालाें पर कुछ इनाम की बाैछार की जायेगी जब तक कि तवे पर राेटी पक नहीं जाये | किसी काे अखलाक बनाया जायेगा ताे किसी काे दलित |

एक आम आदमी क्या चाहता, यही ना कि सुबह उठकर काम पर जाना है | दिनभर काम करना है आैर शाम काे परिवार के साथ कुशलमंगल खाना खा के साे जाना है | लोकिन जब काेई चैन से रहने लगता है ताे नेताआें काे लगता है कि उनकी दुकान मंदी चलने लगी है वाे फिर किसी बेकसूर काे बली का बकरा बनाते हैं |

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