सेक राजनीतिक राेटी सेक

शेक राजनितिक राेटी सेक

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@bhagchand84

भागचन्द सामाेता सीकर

मैं हर दिन सुबह उठ कर यही साेचता हूं कि आज काैन सा राजनेता किस की लाश पर अपनी राजनैतिक राेटियां शेकेगा | राजनीति काे लाेग गंदा कह कर पुकारने लगें हैं | एक जमाना हुआ करता था जब लाेग राजनेताआें पर विश्वास करते थे लेकिन अब यह दूर की बात हाे गई है |

कुछ दिनाे से हैदराबद काे दादरी बनाया जा रहा है | इस बार मरने वाला काेई अखलाख नहीं बल्कि एक दलित नवयुवक है जिसका नाम राेहित है | हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवरसिटी से पीएचडी कर रहे राेहित वेमुला ने 17 जनवरी की रात काे फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी | दलित लाेगाें का साथ पाने के लिये नेता हैदराबद जा पहुंचे जबकि उन नेताआें काे सियाचिन में बर्फ के नीचे दबकर जिंदगी आैर माैत से झूझ रहे भारतीय सेना के जवान से मिलने का समय तब भी नहीं है जबकि उसका ईलाज दिल्ली में चल रहा हाे | दाेनाे घटनाआें में रात दिन का अंतर है लेकिन राजनेताआें की भी काेई गलती नहीं है क्याें कि सेना के जवानाें से राजनीतिक राेटी की काेई उम्मीद नहीं करता है | राेहित के मरने से देश भर के नेताआें ने उसकी जाती जानने के बाद राजनीति शुरू कर दी | मिडिया के लिये भी यही बहस का मुद्दा बन गया | मिडिया भी यह कह कर बहस करता है कि आखिर यह एक छात्र की हत्या का मामला हैं | जबकि मेरे गले मिडिया की यह बात नहीं उतर रही है क्याें कि इस देश में छात्र ताे बहुत से मरते हैं | पिछले दिनाें ही गुजरात से इंजनियर बनने के लिये काेटा आये छात्र नितेश ने फन्दा लगाकर आत्महत्या कर ली थी | तब काेई भी राजनीतिक दल हंगामे पर नहीं उतरा | आंकडे. देखने से भी यह बात सही निकलती है कि छात्राें के मरने से किसी काे कुछ नहीं पडी है | साल 2013 में लगभग 15 छात्र-छात्राआें, 2014 में 12 तथा 2015 में लगभग 26 छात्र-छात्राआें ने फांसी लगाकर अपनी जिंदगी काे छाेड़ दिया | यहां ताे मरने वाला छात्र केवल वही कहलाता है जाे मिडिया के लिये नाेट आैर नेताआें के लिये वाेट बरसा सके | मुझे याद आ रहा है एक बार किसी न्यूज चैनल ने एक व्यग्य कार्टून दिखाया था जिसमें एक नवयुवक आत्महत्या कर रहा हाेता है आैर नीचे खड़े कुछ नेता टाईप लाेग पूछ रहे हाेते हैं कि भाई अपनी जाति बताकर मरना बाद में परेशानी हाेती है | ये कार्टून जिसने भी बनाया उसमें काफी गंम्भीरता थी | मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि आज जाे नेता दलित के प्रति हमदर्द बनकर खड़े हैं ये नेता तब कहां थे जब हरियाणा के लगभग 100 दलित सामूहिक रूप से मुस्लिम बन गये थे | शायद उस दिन मुस्लिम वाेट बैंक खाे देने का डर सता रहा था | देश में हर साला सैकड़ाें किसान आत्महत्या करते हैं तब किसी की आंख में आंसू नहीं हाेता हां कई बार राजस्थान के गजेन्द्र जैसा आदमी मरता है ताे उसकाे गरीब किसान बनाने की पूरी काेशिश की जाती है जबकि गजेन्द्र की बेटी चिल्ला – चिल्ला कर कहती है कि मेरे पिताजी ने किसानी की वजह से फंदा नहीं लगाया | इन सब का एक ही कारण है कि जहां से वाेट व नाेट बैंक पर असर हाेने की संभावना हाेती है वहीं मरने वाले की कीमत हाेती है | मुझे लगता है पिछले कुछ वर्षाें में हमारे देश में इंसान कम मरते हैं | यदि काेई मरता है ताे वह दलित, मुस्लिम, सिख्ख या ईसाई हाेता है |

मेरा प्रश्न यही है कि क्या राजनीति सिर्फ लाशाें का जातिगत आैर धार्मिक तमाशा बनाकर बेचने तक सीमित रह गई है |

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2 Responses

  1. Melina
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